Tuesday, November 3, 2009

आंखों की शर्म


" बूढी हुई शाम के संग, बेसुध सवेरा हो गया,
पवन ने जो छोड़ी गति, पागल जमाना हो गया।

आंखों की शर्म, ओहदों पर भारी लगी,
इक ईशारे पर सूरज, जब चंदा संग हो गया। "

(यह चार पंक्तियां किसी प्रसंग विशेष पर किसी व्‍यक्ति विशेष के लिए लिखी गई है, आप तो बस भाव समझ कर इन पंक्तियों का आनंद उठाईये)

5 comments:

  1. Bahut sundar panktiyan hain!

    ReplyDelete
  2. bahut hi achhi rachna...ek suggestion doon to bura to nahi manenge...blog ka background black hai jiski wajah se padhne mein dikkat hoti hai...waise i like ur blog

    ReplyDelete
  3. ब्‍लॉग्‍स की दुनिया में मैं आपका खैरकदम करता हूं, जो पहले आ गए उनको भी सलाम और जो मेरी तरह देर कर गए उनका भी देर से लेकिन दुरूस्‍त स्‍वागत। मैंने बनाया है रफटफ स्‍टॉक, जहां कुछ काम का है कुछ नाम का पर सब मुफत का और सब लुत्‍फ का, यहां आपको तकनीक की तमाशा भी मिलेगा और अदब की गहराई भी। आइए, देखिए और यह छोटी सी कोशिश अच्‍छी लगे तो आते भी रहिएगा


    http://ruftufstock.blogspot.com/

    ReplyDelete
  4. Bhaai kamalesh ji, aapke blog par aakar aachchhaa lagaa. Sachamuch aap man ko shanti dene vali saadagi bhari vaani paroste hain. Parosate rahen.

    ReplyDelete